बुधवार, 10 अगस्त 2016

ऐ री सुधामयी भागीरथी.....

            कल सावन का तीसरा सोमवार था ,काशी के आराध्य देव महादेव की आराधना का खास दिन। खूब चहल पहल रही । प्रबल प्रवाह युक्त मां गंगा की चपलता भी दर्शनीय है । अहा ! कितना विस्तृत हो गया है मैया का पाट..। यह और भी विस्तार ले रहा है ।मानो , शिवाभिषेक को उत्सुक कोई शिवानुरागी बढ़ता चला आ रहा हो , अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ ।
सामान्य दिनों में , विशिष्ट मनोरंजन के आग्रही जनों से गुलजार रहने वाला , संपूर्ण बालुका तट , अथाह जल-राशि से आच्छादित है । नौकायन की गति मद्धिम है । नाविकों नें नावों को किनारे से बांध दिया है । जल - तल तेजी से बढ़ रहा है । पंडा जी लोग नहीं दिख रहे हैं । पूजा - अर्चना के , उनके "छत्रधारी आसन" सुरक्षित स्थानों पर पंहुचा दिए गए हैं । मल्लाहों की बातचीत से लग रहा है , पानी अभी और बढ़ेगा ,कारण, पहाङों पर खूब बरसात हुई है ।
                   जश्न - ए - आजादी के नाम पर हफ्ते भर चलने वाले कार्यक्रम का सिलसिला आज ही शुरू हुआ है । सुबह - ए - बनारस के स्थायी मंच से ऊपर , पश्च्छिम तरफ जश्न - ए - आजादी का मंच सजा है । भारत की शान में कसीदे पढ़े जा रहे हैं । कुछ किस्से भी गढे जा रहे है । ये लाये गए लोग है । स्थानीय लोगों का इससे कोई जुड़ाव नहीं दिख रहा है ।
मां गंगा की वेगवती धारा आह्लादित कर रही है । अद्भुत रोमांच का अनुभव हो रहा है । यद्यपि ,  इसमें भय की हल्क़ी -  सी सिहरन भी है । मन कर रहा है पूछूँ - ठहरी हुयी जल -  राशि से अभद्रता की हद तक व्यापारिक अठखेलियां करने वाले तथाकथित ठेकेदारों ! अब कहाँ हो ? आओ ! मां गंगा तुम्हें बुला रही हैं । आज सुबह ही कहीं पढ़ रहा था ,  केंद्रीय मंत्री उमा भारती जी कह रही थी ,  गंगा के लिये कानून बनेगा । उफ्फ ! ये लोग समझते क्यों नहीं । सीधी - सी बात है - नदी वेगेन शुद्धयति...और कुछ नहीं...कुछ भी नहीं ।
हजारों साल पहले ,पुराणकार ने एक नैतिक आचार संहिता बनायी थी...
              गंगा पुण्यजलां चतुर्दशां किवर्जयेत ।
              शौचमाचनं केशं निर्माल्यमघर्षणम ।
              गात्र संवाहनं क्रीडां प्रतिग्रहमथरोतिम ।
              अन्य तीर्थ रति चैथ अन्य तीर्थ प्रशंसम ।
               वस्त्र त्यागमथाघाताम् संतारं च विशेषतः ।
                (व्रह्माण्ड पुराड , अध्याय 1 , श्लोक 535)
          अर्थात , पूण्य तीर्थ भागीरथी गंगा में 14 कार्य न करें...समीप में शौच , केशं सवारना , निर्माल्य डालना , शरीर मलना , मैल छुड़ाना , हंसी - मजाक करना , प्रतिग्रह लेना , दूसरे तीर्थ के प्रति अनुराग , रति क्रिया , दूसरे तीर्थ की प्रशंसा , कपडा धोना , जल पीटना , गंगा जी में कुल्ला दतुअन करना , तैरना ...।
                यह कानून ही तो था । मुझे गुस्सा आ रहा है कानून का पालन करवाने वाले , ज्ञान - गठरी ढोने वाले , स्वघोषित सर्वश्रेष्ठ कर्मकांडी ब्राह्मणों पर । मैं पूछना चाहता हूँ , क्या तुमने ब्रह्माण्ड पुराण की यह आचार संहिता नहीं देखी..? अगर देखी , तो पतित पावनी , मोक्ष दायिनी मां गंगा के पावन तट पर अपनी स्वार्थ - सिद्धि का बाजार क्यों बसाया..? तुम पर यह दोष सिद्ध है । किसी और की नाफर्मानियों की ओर उंगली दिखाकर तुम अपने दोष से नहीं बच सकते । तुम्हें इसका प्रायश्चित करना होगा । हाँ ! तूुम्हें ही करना होगा । ओह ! मैं शायद कटु हो चला हूँ ।
जश्न - ए - आजादी के मंच के ठीक पीछे , अस्सी घाट के मुख्य मार्ग पर , थोड़ा आगे की ओर , स्वच्छता अभियान के नारे के साथ अस्तित्व में आये पानी के ए टी एम के पास बैठे मुस्ताक भाई अपनी बाँसुंरी से  सुर साध रहे हैं । हालाँकि यह बांसुरी बेचने , ग्राहकों को रिझाने का एक उपक्रम मात्र है , फिर भी, है तो सुर - साधना ही .....बेईमान है बड़ा , बेईमान है आज