परमहंस आश्रम ....शक्तेषगढ़ ।चुनार से राजघाट जाने वाले मार्ग पर , राजगढ़ से पहले , एक दिव्य - भव्य और मनोरम संत - आश्रम , जिसकी दीवारें भी जीवन की सीख सिखाती हैं ,सीखने के इच्छुक को ....सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेक शरणं व्रज ....।
दोपहर का समय ..प्रचंड धूप लेकिन आश्रम परिसर में उतनी ही हरियाली - उतनी ही घनी छांव । स्वामी जी बाहर गए हैं , संभवत मुंबई । उनकी अनुपस्थिति में भी आश्रम उतना ही गरिमामय है । यह, यहां के साधू वेषी प्रशासकों का प्रताप है ,शायद । कभी-कभी उनकी डांट - डपट वाली रुखी आवाज असहज करती है , लेकिन लोग भी तो माशाअल्लाह ही हैं ।आश्रम में प्रवेश से ठीक पहले , द्वार के दोनों तरफ जामुन के दो पेड़ हैं - फिलहाल खूब पकी काली काली जामुनों हैं। मैंने भी जमीन पर गिरे कुछ जामुन उठा कर चखे .. अहा ! क्या स्वाद है ।बाजार की जामुन तो कठ जामुन होती है , थोड़ा कसैलापन होता है उसमें। यह पूरी तरह मीठी है ..लाजवाब स्वाद। यह पूरी तरह पकने के बाद , खुद से डाल छोड़ने का स्वाद है शायद। महात्माओं के दरबार में होने के कारण, ये स्वाद - लोभ के पत्थरों से सुरक्षित है अन्यथा , अपरिपक्व डाल से बिछुडतीं तो खुद भी कटु होती और स्वाद - आग्रही के मन को भी तिक्त करतीं। हमने सीखा - सचमुच में तृप्त होना चाहते हैं तो फल को पेड़ पर पकने दें , उसके गिरने तक धैर्य धारण करें ,थोड़ा अनुशासन स्वीकार करें और फिर , बेमिसाल स्वाद का अद्भुत आनंद लें । अंदर आश्रम में भोजन - प्रसाद बंट रहा है- हमने भी, भावपूर्वक ग्रहण किया ..अद्भुत आनंदप्रदायक और रस सिक्त । अब लौटना है , दीवारें सिखा रही हैं -
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगोभवति दुःखहा ....