सोमवार, 15 अगस्त 2022

गंगे ! तव दर्शनात मुक्तिः

कभी-कभी स्वयं के साथ बैठने पर अनुभव होता है कि शब्दों की सामर्थ्य बहुत सीमित  है ,अनुभूति की गहनता के सापेक्ष। उसमें भी, सामने मां गंगा हो , तो स्व अनुभूति योग के कहने ही क्या ..। सोच रहा हूँ - कैसी विडम्बना है -  पापाचार, पाखंड और मिथ्याचार शब्दों के शानों पर बैठकर अपना धंधा कर रहे है , सीमित सामर्थ्य वाले शब्द दुनिया की हॉट में पूरी ठसक  से खनक रहे हैं और अनुभूति असहाय है ... बे- मोल। भवभूति याद आ रहे हैं ...होते तो पूछता, क्यों लिखा आपने ..जागर्सि जाह्नवी । खैर ..अनुभूति  की उस गहनता की मीमांसा अपनी गति से परे है । भवभूति की भवभूति ही जाने , मै तो मां गंगा के सावन के सौन्दर्य के मोहपाश में हूं,अब मेरे यहां शब्दों का कोई काम नहीं ...।
         सचमुच ...गंगे ! तव दर्शनात मुक्तिः

गुरुवार, 14 जुलाई 2022

परमहंस आश्रम , शक्तेषगढ

परमहंस आश्रम ....शक्तेषगढ़ ।चुनार से राजघाट जाने वाले मार्ग पर , राजगढ़ से पहले , एक दिव्य - भव्य और मनोरम संत - आश्रम , जिसकी दीवारें भी जीवन की सीख सिखाती हैं ,सीखने के इच्छुक को ....सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेक शरणं व्रज ....।
दोपहर का समय ..प्रचंड धूप लेकिन आश्रम परिसर में उतनी ही हरियाली - उतनी ही घनी छांव । स्वामी जी बाहर गए हैं , संभवत मुंबई । उनकी अनुपस्थिति में भी आश्रम उतना ही गरिमामय है । यह, यहां के साधू वेषी प्रशासकों का प्रताप है ,शायद । कभी-कभी उनकी डांट - डपट वाली रुखी आवाज असहज करती है , लेकिन लोग भी तो माशाअल्लाह ही हैं ।आश्रम में प्रवेश से ठीक पहले , द्वार के दोनों तरफ जामुन के दो पेड़ हैं - फिलहाल खूब पकी काली काली जामुनों हैं। मैंने भी जमीन पर गिरे कुछ जामुन उठा कर चखे .. अहा ! क्या स्वाद है ।बाजार की जामुन तो कठ जामुन होती है , थोड़ा कसैलापन होता है उसमें। यह पूरी तरह मीठी है ..लाजवाब स्वाद। यह पूरी तरह पकने के बाद , खुद से डाल छोड़ने का स्वाद है शायद। महात्माओं के दरबार में होने के कारण, ये स्वाद - लोभ के पत्थरों से सुरक्षित है अन्यथा , अपरिपक्व डाल से बिछुडतीं तो खुद भी कटु होती और स्वाद - आग्रही के मन को भी तिक्त करतीं। हमने सीखा - सचमुच में तृप्त होना चाहते हैं तो फल को पेड़ पर पकने दें , उसके गिरने तक धैर्य धारण करें ,थोड़ा अनुशासन स्वीकार करें और फिर , बेमिसाल स्वाद का अद्भुत आनंद लें । अंदर आश्रम में भोजन - प्रसाद बंट रहा है- हमने भी, भावपूर्वक ग्रहण किया ..अद्भुत आनंदप्रदायक और रस सिक्त । अब लौटना है , दीवारें सिखा रही हैं - 
   युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु 
   युक्तस्वप्नावबोधस्य योगोभवति दुःखहा ....

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

सुबह ए बनारस

घाट बनारसिया

गंगा आरती, अस्सी घाट, बनारस

श्री परमहंस आश्रम, शक्तेशगढ, चुनार

चालत चालत पग थका, नगर रहा नव कोस ।
बीचे में डेरा गिरा , कहौ कौन का दोस ।। 
मन युक्ति सों ही रुके , माला टालो लाख। 
सद्गुरु प्रेरक आत्मा , मानव का बल खाख ।।
योग अगिनि सद्गुरु कृपा , जागत मन के बीच ।
'अड़गड़' सद्गुरु ना मिला , भजन जल्पना कीच।।

स्वर्ण मंदिर,अमृतसर

"अठ सठि तीरथ जहं साध पग धरहि " मतलब गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब, अमृतसर, पंजाब। दुनिया इसे स्वर्ण मंदिर के नाम से जानती है। हृदय-स्थल है यह सिख धर्म का । गुरु - स्वरुप पवित्र गुरुग्रंथ साहिब यहीं विराजित हैं।  
भारतीय दर्शन परम्परा का नायाब खजाना है इसमें। बारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच, पांच सौ वर्षों के बीच की आध्यात्मिक तत्व मीमांसा का सार संकलन है गुरु ग्रंथ साहिब। कुल 36 संत कवियों की प्रतिनिधि बानियों का संयुक्त स्वरुप। यह गुरु - दरबार, सेवा - भाव की ऐसी मिशाल है  ,जो अन्यत्र दुर्लभ है । कहते हैं - चौथे गुरु अर्जुन साहिब ने, लाहौर के मुस्लिम संत हजरत मियां मीर से इसकी नींव रखवायी थी। अगर इस प्रतीक का मर्म समझा जा सके, तो धर्म समझा जा सकता है और जिया भी   ....।
            इक ओंकार सतनाम .........।
    वाहे गुरु दा ख़ालसा वाहे गुरु दी फतेह ... ।