अब,जब मथुरा से लौटने को हूं ...सोच रहा हूँ -मथुरा से वृन्दावन तक कई सारे मंदिरों की दौड़ लगा ली,कृष्ण के नाम पर बड़े बड़े आयोजन देख लिए,राधे राधे की टेर सुन ली,स्वनामधन्य पंडों -पंडितों के प्रवचनों का श्रवण पान भी कर लिया,लेकिन ब्रजवारन को प्रेम का साक्षात्कार नहीं हुआ।मैं सोच रहा हूँ -मेरी भाग-दौड़ सीमा बन्द थी या मेरी खोज ही मृग मरीचिका सादृश्य है।कृष्ण से साक्षात्कार कराने के तमाम विग्यापन ब्रजनगरी में विग्यापित हैं लेकिन कृष्ण इन विग्यापकों के कब से हो गये ..?
निष्काम कर्म के सिद्धांत कार की कृष्ण नामी ओढ़े,उन्नत ललाट,शुभ्रवसनधारियों के सब कर्म सकाम हैं।जसोदा के कृष्ण,देवकी के कृष्ण,सुदामा के कृष्ण,बलदाउ के कृष्ण,अर्जुन के कृष्ण,राधिका के कृष्ण,रूक्मिणी के कृष्ण,द्रौपदी के कृष्ण,उधौ के कृष्ण मथुरा के कृष्ण,द्वारिका के कृष्ण ..मेरे लिखे की सीमा है किंतु कृष्ण का स्वरूप तो सीमातीत है ।
निष्काम कर्म के प्रस्तोता की लीला - भूमि पर इसके प्रभाव की रंचमात्र अनुभूति भी तो नहीं हुई।हाय! महादुख पाये सखा तुम आये इतै न कितै दिन खोये,कहकर गरीब सुदामा को भर अंकवार भेंटनें वाले मनमोहन के ब्रजमंडल में अब गरीब सुदामा का कोई तारनहार नहीं है बल्कि मौका मिले तो जय श्रीकृष्णा और राधे-राधे का जाप करते जेबतराश अवश्य अपनी उपस्थिति का अहसास करा देंगे।एक आटो वाला १० के ३० मांग रहा था।श्रद्धा -भाव से अविभूत श्रद्धालु कहाँ प्रतिवाद करते,एक स्थानीय व्यक्ति झगड़ बैठा।आटो वाले का कुतर्क धर्म-धारित करने वाली इस नगरी की वर्तमान पंडिताई की बानगी था - ओए ताऊ ! सीजन में दो रूपये किलो का आलू बीस रूपये किलो बिकता है, दो - तीन दिन का मामला है फिर तो वही राधे-राधे, जय श्रीकृष्ण।खैर! यह- युग - संक्रमण है ।
पूजा - प्रसाद बाटते एक लक दक पंडाल का लाउडस्पीकर भजन प्रसरित कर रहा था,भजन की टेक थी - कन्हैया कहाँ मिलैगो...।मैं सोचने लगा,यह सवाल उस ब्रज में क्यों पूछा जा रहा है,जहाँ छछिया भर छाछ पर कन्हैया नृत्य करते थे।यह बात इतने से स्पष्ट न हो,शायद ....
सेस,गनेश,महेश,दिनेश,सुरेशहु जाहि निरन्तर गावै
जाहिअनादि,अनन्त,अखंड,अछेद,अभेद,सुबेद बतावै
नारद से शुक व्यास रटें,पचिहारे तउ पुनि पार न पावै
इतना ही नहीं ,
गावै गुनी गनिका,गन्धर्व ओ सारद सेस सबै गुण तावै
नाम अनन्त,गनन्त गनेश जो ब्रह्म त्रिलोचन पार न। पावै
जोगी,जती,तपसीअरू सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि। लगावै
ताहि अहीर की छोहरियां,छछिया भर छाछ ने नाच। नचावत
ऐसे ब्रज में , जिसे खुद कृष्ण भी विस्मृत नहीं कर पाते -उधौ ! मोहि ब्रज बिसरत नाहि,में कन्हैया कहाँ मिलैगो की टेर क्यों लगने लगी..।वास्तव में लोग यही भूल गए कि योगीराज कृष्ण का कुल कृतित्व मनुष्यत्व की स्थापना के निमित्त था।भव्य भंडारों की जगह उन्हें गुरूमाता के चने की चाव थी।वह तन्वुल का तगादा करते हैं और प्रेम की टेर पर सब कुछ भूल जाते हैं।यहाँ वह साख्य भाव,वह प्रेम ही तिरोहित हो गया है।रसखान ने बड़े सलीके से बताया है - कन्हैया कहाँ मिलेंगे ...
ब्रह्म में ढूढ्रयो पुरानन-गानन वेद रिचा सुनि चौगुने गायन
देख्यो,सुन्यो कबहूं न कहूं वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन
टेरत ,हेरत हारि परयो रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देख्यो दुरो वह कु्ंज कुटीर में बैठो पलोटतु राधिका -पायन ।
