शनिवार, 3 जुलाई 2021

कन्हैया कहाँ मिलैगो .....

           अब,जब मथुरा से लौटने को हूं ...सोच रहा हूँ -मथुरा से वृन्दावन तक कई सारे मंदिरों की दौड़ लगा ली,कृष्ण के नाम पर बड़े बड़े आयोजन देख लिए,राधे राधे की टेर सुन ली,स्वनामधन्य पंडों -पंडितों के प्रवचनों का श्रवण पान भी कर लिया,लेकिन ब्रजवारन को प्रेम का साक्षात्कार नहीं हुआ।मैं सोच रहा हूँ -मेरी भाग-दौड़ सीमा बन्द थी या मेरी खोज ही मृग मरीचिका सादृश्य है।कृष्ण से साक्षात्कार कराने के तमाम विग्यापन ब्रजनगरी में विग्यापित हैं लेकिन कृष्ण इन विग्यापकों के कब से हो गये ..?
निष्काम कर्म के सिद्धांत कार की कृष्ण नामी ओढ़े,उन्नत ललाट,शुभ्रवसनधारियों के सब कर्म सकाम हैं।जसोदा के कृष्ण,देवकी के कृष्ण,सुदामा के कृष्ण,बलदाउ के कृष्ण,अर्जुन के कृष्ण,राधिका के कृष्ण,रूक्मिणी के कृष्ण,द्रौपदी के कृष्ण,उधौ के कृष्ण मथुरा के कृष्ण,द्वारिका के कृष्ण ..मेरे लिखे की सीमा है किंतु कृष्ण का स्वरूप तो सीमातीत है ।
             निष्काम कर्म के प्रस्तोता की लीला - भूमि पर इसके प्रभाव की रंचमात्र अनुभूति भी तो नहीं हुई।हाय! महादुख पाये सखा तुम आये इतै न कितै दिन खोये,कहकर गरीब सुदामा को भर अंकवार भेंटनें वाले मनमोहन के ब्रजमंडल में अब गरीब सुदामा का कोई तारनहार नहीं है बल्कि मौका मिले तो जय श्रीकृष्णा और राधे-राधे का जाप करते जेबतराश अवश्य अपनी उपस्थिति का अहसास करा देंगे।एक आटो वाला १० के ३० मांग रहा था।श्रद्धा -भाव से अविभूत श्रद्धालु कहाँ प्रतिवाद करते,एक स्थानीय व्यक्ति झगड़ बैठा।आटो वाले का कुतर्क धर्म-धारित करने वाली इस नगरी की वर्तमान पंडिताई की बानगी था - ओए ताऊ ! सीजन में दो रूपये किलो का आलू बीस रूपये किलो बिकता है, दो - तीन दिन का मामला है फिर तो वही राधे-राधे, जय श्रीकृष्ण।खैर! यह- युग - संक्रमण है ।
             पूजा - प्रसाद बाटते एक लक दक पंडाल का लाउडस्पीकर भजन प्रसरित कर रहा था,भजन की टेक थी - कन्हैया कहाँ मिलैगो...।मैं सोचने लगा,यह सवाल उस ब्रज में क्यों पूछा जा रहा है,जहाँ छछिया भर छाछ पर कन्हैया नृत्य करते थे।यह बात इतने से स्पष्ट न हो,शायद ....
    सेस,गनेश,महेश,दिनेश,सुरेशहु जाहि निरन्तर गावै
    जाहिअनादि,अनन्त,अखंड,अछेद,अभेद,सुबेद बतावै
   नारद से शुक व्यास रटें,पचिहारे तउ पुनि पार न पावै
इतना ही नहीं ,
    गावै गुनी गनिका,गन्धर्व ओ सारद सेस सबै गुण तावै
    नाम अनन्त,गनन्त गनेश जो ब्रह्म त्रिलोचन पार न।         पावै
     जोगी,जती,तपसीअरू सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि।        लगावै
    ताहि अहीर की छोहरियां,छछिया भर छाछ ने नाच।         नचावत
              ऐसे ब्रज में , जिसे खुद कृष्ण भी विस्मृत नहीं कर पाते -उधौ ! मोहि ब्रज बिसरत नाहि,में कन्हैया कहाँ मिलैगो की टेर क्यों लगने लगी..।वास्तव में लोग यही भूल गए कि योगीराज कृष्ण का कुल कृतित्व मनुष्यत्व की स्थापना के निमित्त था।भव्य भंडारों की जगह उन्हें गुरूमाता के चने की चाव थी।वह तन्वुल का तगादा करते हैं और प्रेम की टेर पर सब कुछ भूल जाते हैं।यहाँ वह साख्य भाव,वह प्रेम ही तिरोहित हो गया है।रसखान ने बड़े सलीके से बताया है - कन्हैया कहाँ मिलेंगे ...
   ब्रह्म में ढूढ्रयो पुरानन-गानन वेद रिचा सुनि चौगुने गायन
    देख्यो,सुन्यो कबहूं न कहूं वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन
      टेरत ,हेरत हारि परयो रसखानि बतायो न लोग लुगायन
      देख्यो दुरो वह कु्ंज कुटीर में बैठो पलोटतु राधिका -पायन ।
              लगता है,हम खुली आखों के धोखे में फंस गये ..नहीं तो,यह सच तो सूरदास भी जानते थे ...सबसे ऊंची प्रेम सगाई ...।

केन ...जो शजर गढती है ।



हथेली पर , 
थोड़ी सी ,
जल - राशि ठहराकर ,
देखता रहा ....अपलक। 
तमाम पत्थरों से लड़ते - झगड़ते, सहलाते - दुलराते, इठलाती - बलखाती बही जा रही है केन। 
स्वच्छ ,शीतल और अमृतत्व से भरी, 
दुनिया की इकलौती नदी - जो शजर गढती है। 
मुम्बई की मशीनों में तराशे जाने के बाद ,
ईरानी बाजार में ,
मुहमांगी कीमत पर बिकते हैं शजर। 
किनारों पर आबाद, 
आबादी के ठीहों पर बैठे मुम्बईया कारोबारी,  और 
स्थानीय शजर शोधकों के गठजोड़ से बेपरवाह ,
शजर अब भी गढ रही है केन। 
अपने ही सगे - शुभचिन्तक बाजार के प्रभाव में हैं, 
खूब जानती है केन। 
बावजूद इसके, अपने स्वभाव में है केन। 
यमुना में मिलकर, 
यमुना हो जाने से पहले, 
अब भी, 
नित नये शजर गढती है केन। 

अद्भुत है खजुराहो का शिल्प ...

अद्भुत है ..अप्रतिम है ..अनिर्वचनीय है  - तुम्हारी कारीगरी ।
अभिभूत आँखें आबद्ध हैं ,
तुम्हारे शिल्प के मोहपाश में ।
खजुराहो के शिल्पी ! 
प्रणम्य है तुम्हारी साधना। 
यद्यपि, आज 
अ क्षत नही है एक भी आकृति ,
अंग-भंग आकृतियों का मौन चीख रहा है, कि 
ऐसा भी दौर गुजरा है ।
सुनो - अगर सुन सको ,
समझो - अगर समझ सको ,
कितना जहर था उन आक्रान्ताओं में,
जिन्हें त्रिभंग का सौन्दर्य रास न आया ।
हाथ में आरसी थामें,  खुद को सवांरती 
शर्माती-सकुचाती ,
नव यौवना की नाक टूटी पडी़ है ।
सद्य स्नाता का मुख ,
खिड़की का पट खोल झांकती युवती की आंखें ,
पायल पहनती ,
सिन्दूर लगाती ,
केश के साथ कौतुक करती अप्सराओं ,
अपने ही पांव का काटा निकालती स्त्री ,
जैसी हजारों कलाकृतियों के अंग, भंग हैं ।
मंदिरों के सारे बिग्रह टूटे पड़े हैं ।
हम शर्मिंदा हैं शिल्पी, 
इस छल से ,कि
इतिहास की किताबों के कई सारे पाठ, अब भी 
इन्हीं वहशी आक्रान्ताओं के नाम हैं ।
मैं लौट रहा हूँ - स्वअनुभूत भाव - निर्मिति के साथ, कि शहंशाहों  की सनक से संस्कृतियाँ विनष्ट हो जाती हैं, कि
इतिहास सब कुछ नहीं बताता, और 
इतिहास जो बताता है वही पूर्ण सत्य नहीं होता ।
इतिहास, सायास आयोजन है,
कई बार , निश्चित स्थापना के प्रयोजन से युक्त ,
नृप - राग से भरा ,
कई बार संशय संयुक्त ।

अलविदा ! मंगलेश दा ...

           आप ने तो मुक्तिपथ की राह ले ली मंगलेश दा! सचमुच में, "घटती हुयी आक्सीजन" से छटपटाते और  घटते जा रहे आपसी "स्पेस" से अकुलाते मन की व्यथा अब कौन कहेगा ? आप तो पहाड़ के आदमी थे  ,भले ही मैदान उतर आये थे, जीवट तो वही था - पहाड़ वाला। ठीक कहा आपने,इस दुनिया में, जहाँ हम ही रहते हैं  - अब सांस लेना भी मेहनत का काम लगता है  .......अलविदा मंगलेश दा !

अक्सर पढ़ने में आता है
दुनिया में ऑक्सीजन कम हो रही है
कभी ऐन सामने दिखाई दे जाता है कि वह कितनी तेज़ी से घट रही है
रास्तों पर चलता हूँ खाना खाता हूँ पढ़ता हूँ सोकर उठता हूँ
तो एक लंबी जमुहाई आती है
जैसे ही किसी बंद वातानुकूलित जगह में बैठता हूँ
उबासी एक झोंका भीतर से बाहर आता है
एक ताक़तवर आदमी के पास जाता हूँ
तो तत्काल ऑक्सीजन की ज़रूरत महसूस होती है
बढ़ रहे हैं नाइट्रोजन सल्फ़र कार्बन के ऑक्साईड
और हवा में झूलते अजनबी और चमकदार कण
बढ़ रही है घृणा दमन प्रतिशोध और कुछ चालू क़िस्म की खुशियां
चारों ओर गर्मी स्प्रे की बोतलें और खुशबूदार फुहारें बढ़ रही हैं

अस्पतालों में दिखाई देते हैं ऑक्सीजन से भरे हुए सिलिंडर
नीमहोशी में डूबते-उतराते मरीज़ों के मुँह पर लगे हुए मास्क
और उनके पानी में बुलबुले बनाती हुई थोड़ी सी प्राणवायु
ऐसी जगहों की तादाद बढ़ रही है
जहाँ सांस लेना मेहनत का काम लगता है
दूरियां कम हो रही हैं लेकिन उनके बीच निर्वात बढ़ता जा रहा है
हर चीज़ ने अपना एक दड़बा बना लिया है
हर आदमी अपने दड़बे में क़ैद हो गया है
स्वर्ग तक उठे हुए चार-पांच-सात सितारा मकानात चौतरफ़
महाशक्तियां एक लात मारती हैं
और आसमान का एक टुकड़ा गिर पड़ता है
ग़रीबों ने भी बंद कर लिये हैं अपनी झोपड़ियों के द्वार
उनकी छतें गिरने-गिरने को हैं
उनके भीतर की हवा वहां दबने जा रही है

आबोहवा की फ़िक्र में आलीशान जहाज़ों में बैठे लोग
जा रहे हैं एक देश से दूसरे देश
ऐसे में मुझे थोड़ी ऑक्सीजन चाहिए
वह कहाँ मिलेगी
पहाड़ तो मैं कब का छोड़ आया हूँ
और वहाँ भी वह
सि़र्फ कुछ ढलानों-घाटियों के आसपास घूम रही होगी
दम साधे हुए मैं एक सत्ताधारी के पास जाता हूँ
उसे अच्छी तरह पता है दुनिया का हाल
मुस्कराते हुए वह कहता है तुम्हें क्यों फ़िक्र पड़ी है
जब ज़रूरत पड़े तुम माँग सकते हो मुझसे कुछ ऑक्सीजन।

श्री राधा रानी मंदिर, बरसाना, मथुरा

              आना हो और राधा -कृष्ण  प्रेम के अद्भुत गायक रसखान की याद न आये, ऐसा हो नही सकता ....

प्रेम कथानि की बात चलैं चमकै चित चंचलता चिनगारी।
लोचन बंक बिलोकनि लोलनि बोलनि मैं बतियाँ रसकारी।
सोहैं तरंग अनंग को अंगनि कोमल यौं झमकै झनकारी।
पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्‍यारी।

अहो पथिक कहियो उन हरि सों ...विशेष सन्दर्भ : मथुरा की यमुना

          अहो पथिक कहियो उन हरि सों ....विरह -व्यथा से पीडित गोपी के लिए तो फिर भी एक आलम्ब था लेकिन हम कालिंदी के ' कारी ' होने का संदेशा किसको भेजें ...? उसकी तडपन रुपी तरंग भी अब शांत है और भंवरें तो उसमें अब पडती ही नहीं ....अब इसके किनारे कोई चक्रवाकी पी पी नहीं रटती ...बाजार टेरता है ...स्वारथ की टेर।

 देखियत कालिंदी अति कारी |
अहौ पथिक कहियौ उन हरि सौं, भयौ बिरह जुर जारी ||
गिरि-प्रजंक तैं गिरति धरनि धसि, तरंग तरफ तन भारी |
तट बारू उपचार चूर, जल-पूर प्रस्वेद पनारी ||
बिगलित कच कुस काँस कूल पर पंक जु काजल सारी |
भौंर भ्रमत अति फिरति भ्रमित गति, निसि दिन दीन दुखारी ||
निसि दिन चकई पिय जु रटति है, भई मनौ अनुहारी |
सूरदास-प्रभु जो जमुना गति, सो गति भई हमारी ।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

प्रेम सरोवर, वृन्दावन, मथुरा

'बरसाना' से नंदगांव जाते हुए रास्ते में 'संकेत' गांव है। कहते हैं - कभी यह 'संकेत वन' था। यहीं पहली बार राधा -कृष्ण का आमना सामना हुआ था, मिले थे। यहां एक मंदिर है। कालान्तर में, सूरदास जी ने इस मिलाप का बड़ा सुन्दर चित्रण किया  - 
       खेलत हरि निकसै ब्रज-खोरी
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा,चक, डोरी ॥
मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि बर, बसन-दमक दामिनि-छबि छोरी ।
गए स्याम रबि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी ॥
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिये रोरी ।
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी ।
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी ।
सूर स्याम देखत हीं रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥
                 थोडा़ आगे प्रेम सरोवर है और सुदामा की कुटिया भी - देखने वालों के लिए। नंदगांव की तरफ बढते समय एक साइनबोर्ड ने रोक लिया - गोपी - उद्धव संवाद स्थल के बोर्ड ने। यह स्थल सडक से अंदर है ।बोर्ड पर पद पढकर सहज ही रत्नाकर जी के उद्धव शतक की याद हो आयी, जहां प्रेम के आगे ग्यान की गठरी लादे उद्धव महाराज जी निरुत्तर हैं-
  आये लोटि लज्जित नवाए नैन उद्धव अब...
इससे पहले -  क्या क्या नहीं सुनना पडा़ उद्धव को ...
 'आये हो पठाए वा छतोरो छलिया कै इतै '..
इतना ही नहीं, इससे भी आगे और अधिक बेधक तंज -
'आए कंसराई कै पठाए वे प्रत्यक्ष तुम '...के बाद -
 'चुप रहो उधौ पथ मथुरा को गहो' की कठोर सलाह भी .....
वैसे भी अब तक उद्धव ...
भूले जोग - छेम प्रेम नेमति निहारि उधौ 
सकुचि समाने उर -अंतर हरास लौ...।
सचमुच...  प्रेम की गति कितनी गहन है........।

बुधवार, 23 जून 2021

काकंदी तीर्थ, खुखुन्दी, देवरिया

काकंदी मंगलं कुर्यात, पुष्पदंतस्य जन्मभूः। 
आनंदं तनुताद भूमौ, सर्वमंगलकारिणी।। 
                        नवम जैन तीर्थंकर पुष्पदंतनाथ की पंच कल्याणक पावन भूमि - सिद्ध क्षेत्र ......काकंदी तीर्थ।

सूर्य मन्दिर, तुर्क पट्टी, कुशी नगर

एक दिन रात में सोते समय मैंने सपना देखा कि यहीं नीचे सूर्य भगवान की प्रतिमा विद्यमान है ..निश्चित स्थान की तरफ इशारा करते हुये बता रहे थे सुदामा शर्मा। बाद में, जब यह बात उन्होने और लोगों को बतायी तो किसी को यकीन ही नही हुआ। खैर , विश्वास  - अ विश्वास  के बीच स्थानीय लोगों द्वारा की गयी खुदाई में, सुदामा शर्मा द्वारा बताये गये स्थान से दो बेशकीमती सूर्य प्रतिमायें प्राप्त हुयीं। एक के विग्रह खंडित हैं इसलिये यह पूजित नही है। दूसरी मंदिर में स्थापित है। बाकी सब कुछ विशेषज्ञों के अध्ययन का निष्कर्ष है जो नया -पुराना होता रहता है - आप इसमें अपने लिए महत्वपूर्ण तथ्य चुन सकते हैं - 
    कि, यह उत्तर भारत का इकलौता सूर्य मंदिर है। 
    कि, इसमें स्थापित प्रतिमा गुप्तकालीन है ।
    कि, इसमें स्थापित प्रतिमा कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर से भी पुरानी है ।
    कि,  यह प्रतिमा नील मणि पत्थर की बनी है ।
    कि,  इसमें सूर्य देव के अतिरिक्त उनके सात घोड़े, उनकी रानियां , सारथी अरुण, स्वागत मुद्रा में  किन्नर- गंधर्व सहित शनि, राहु ,केतु और अन्य कई लोगों के चित्र भी उत्कीर्ण हैं।
             वैसे, जब मैं सुदामा शर्मा से वहां के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहा था, पूरा परिसर शादी की तैयारी के ताम - झाम से आच्छादित था। मंदिर की पुण्यता - पवित्रता के ख्याल से परे, आज की शाम बड़ी भडकीली  होने वाली थी। मैंने सुदामा शर्मा से पूछा, ये सब क्या है? उन्होंने धीरे से कहा - स्थानीय धनिक के बेटे की तिलक का जलसा है ...मैने देखा - मंदिर के बाहर बैठे युवा पुजारी के कंधे पर पड़ा रंगीन नव पटका खूब फब रहा था।

देवरहा बाबा आश्रम, मईल,देवरिया

यहाँ जो भी निर्माण दिख रहा है, सब 90 के बाद का है। हम जहाँ बैठे हैं, जिस जगह लकड़ी के खम्भों पर एक कुटिया है, यहीं बाबा की मचान हुआ करती थी....पोरसा भर पानी में...सरजू मईया की गोद में। यहां तक बहती थी मईया ।89 में बाब मथुरा चले गए .....समाधि लेने। बाबा के मथुरा गमन के बाद सरजू मईया भी यहाँ से दूर चली गयीं ...दक्षिण की ओर। उन्होंने भी यह स्थान छोड़ दिया। बाबा के संस्मरण सुनाते सुनाते संत श्री कहीं खो - से गए ... बाबा जब बंगाल में थे तो उनके पास तमाम पशु पक्षी भी आते रहते थे ...मिलने के लिए ..बाघ भी। एक दिन बाबा उदाश थे ...कह रहे थे - मोहन भगत अब नहीं रहा ..गुजर गया। यह एक बाघ था ..हां! बाघ ही। देह - चक्षु की एक सीमा है ...  यह उसके आगे नहीं देख सकतीं। इन्होंने उसे बाघ ही देखा था। बाकी,  बाबा जानें। जाने कितने किस्से हैं लोगों के पास ..कितनी कहानियां। अगर आप जानना चाहते हैं तो आप उन तमाम लोगों से मिल सकते हैं जिनकी स्मृति बाबा के सान्निध्य - संजोग से सृजित अद्भुत अनुभूतियों से समृद्ध है। मैं संत - साधना की इस पुण्य भूमि को अपना प्रणाम निवेदित करने आया था ...बाबा करें - यह संयोग पुनः घटे ....ऊंँ नमो भगवते वासुदेवाय .....

डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को क्यो गिरफ्तार किया गया? एक निशान, एक विधान, एक प्रधान का नारा आखिर लगाना ही क्यो पड़ा.? तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी बार बार देश को आश्वस्त कर रहे थे कि कश्मीर सौ फीसदी भारत का अंग है तो फिर इस पर संदेह क्यो था ? इन प्रश्नों का हल ढूढने के कौतूहल ने इतिहास के तत्कालीन दौर में ताक- झाक करने को प्रेरित किया.
 5मार्च 1952 को दिल्ली में आंदोलन की शुरुआत करते हुए डॉ साहब ने लक्ष्य सार्वजनिक  किया था - अन्याय के विरुद्ध न्याय की स्थापना के लिए, तानाशाही के विरुध्द लोकतंत्र की विजय के लिए और विघटन के विरुध्द राष्ट्रीय एकता के लिए. संघर्ष का विगुल फूकते हुए उन्होने महात्मा गांधी को याद किया और सत्याग्रह की घोषणा कर दी.
तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति के संबंध में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा हैं - जनमत की खुली अवग्या कर नेहरू जी ने शेख अब्दुल्ला के साथ ऐसा समझौता कर लिया, जिससे न केवल भारत की एकता पर कुठाराघात हुआ, अपितु जम्मू तथा लद्दाख के 15 लाख निवासियों का भविष्य भी ख़तरे में पड़ गया. समझौते के अंतर्गत कश्मीर को अपना पृथक विधान, पृथक प्रधान तथा पृथक निशान रखने का अधिकार दे दिया गया. सारे देश में उस समझौते का विरोध हुआ. डॉ मुखर्जी ने लोकसभा में अपने अकाट्य तर्कों तथा प्रबल प्रमाणों से उस समझौते को भारत तथा कश्मीर दोनों के लिए अहितकर सिद्ध किया, किंतु नेहरू जी अपने दुराग्रह पर डटे रहे. यहां तक कि जम्मू कश्मीर राज्य की वैधानिक स्थिति में मूलभूत परिवर्तन करने से पूर्व उन्होने जम्मू तथा लद्दाख की जनता के प्रतिनिधियों से परामर्श करना भी आवश्यक न समझा.
ऐसी ही राजनैतिक परिस्थिति के बीच डॉ मुखर्जी ने कहा - हम सत्य के लिए संघर्ष છેड़ रहे हैं. न्याय की रक्षा के लिए बलि - पथ पर पांव आगे बढ़ा रहे हैं. अत्याचारों की अग्निपरीक्षा हमारे रूप को और भी निखार देगी बलिदानों के गौरवपूर्ण इतिहास में एक उज्जवल अध्याय और जुड जाएगा. आओ, उस इतिहास के निर्माण में हाथ बंटाने के लिए कमर कस कर मैदान में कूद पड़े.
10 मई 1953 को रावी के पुल पर कश्मीर मिलिशिया ने जब उनका रास्ता रोका. बिना परमिट कश्मीर में घुसने से मना किया तो डॉ मुखर्जी ने इसे मानने से इंकार कर दिया. कश्मीर सुरक्षा विधान के अन्तर्गत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्‍तारी के पूर्व भारत की महान जनता के नाम संदेश में उन्होंने कहा - मै जम्मू कश्मीर में प्रविष्ट हो गया हूं, लेकिन एक कैदी की हैसियत से.डॉ मुखर्जी ने अपने पराक्रम से परमिट की दीवार ढहा दी थी और इसी के साथ अनावृत हो गया था नेहरू का असत्य संभाषण कि कश्मीर सौ फीसदी भारत का अंग है. गिरफ्तारी के 43 वे दिन 23 जून 1953 की रात रहस्यमय ढंग से उनकी मृत्यु की घोषणा कर दी गई. तो, क्या वे मर गए? नहीं, वे मरे नहीं, विभाजित भारत की अवशिष्ट एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्र की वेदी पर अपने सर्वस्व की बलि चढ़ाकर अमर हो गए.......
          सादर नमन............

चौरी चौरा शहीद स्मारक, गोरखपुर

100 साल होने को आये .... 4 फरवरी 1922 को - अंग्रेजी हुकूमत के काले सिपाहियों के उकसाने पर, मां भारती की आजादी के मतवालों की गुस्साई भीड़ ने अपनी छाती  आगे कर दी थी । कई शहीद हुए और कई घायल । असहयोग आंदोलन के अहिंसक सिपाहियों के लिए , यह घटना बेहद उत्तेजक और क्षुब्ध कर देने वाली थी । इसके बाद इस घटना की प्रतिक्रिया में जो घटा , इतिहास ने उसे अपने ढंग से लिपिबद्ध किया ।चौरी चौरा थाना आग के हवाले कर दिया गया । थाना परिसर में जो भी था , जिंदा जलकर खाक हो गया ।
 इतिहासों के मुखर स्वरों में अमर कहानी कहन हुई ।
 गोरों की बर्बरता काली पलटन से ना सहन हुई ।
 सपन शांति की गरने वाली आंखों में अग्नि स्तवन हुई ।        चौरी चौरा में गोरों की लंका धू-धू कर दहन हुई ।
    प्रतिक्रिया में , गोरों का दमन चक्र बेहद भयानक था ।अंतिम परिणाम - 19 रणबाकुरों को फांसी , 14 लोगों को आजीवन कारावास और कई अन्य लोगों को दूसरी कठिन सजाएं दी गई । यह कोई प्रशिक्षित लोग नहीं थे , आसपास के गांव के आमजन थे, जिन्होंने भारत की आजादी के हवन कुंड में , अपनी जान की आहुति अर्पित कर दी थी ....
 देकर अपना रक्त जिन्होंने भारत भाग्य संवारा है ।
 सामंतवाद के मुंह पर बढ़कर एक तमाचा मारा है ।
 शौर्य की इस धरती पर डटकर सिंहों ने ललकारा है ।    अंग्रेजों का दंभ जहां पर रणवीरों से हारा है ।
       चौरी चौरा शहीद स्मारक में , इन 19 शहीदों सहित आजादी के कई अन्य दीवानों की प्रतिमा स्थापित है। इन पर अंकित तथ्य बताते हैं कि अधिकांश ने 40 वर्ष की आयु भी नहीं जी और कई तो 30 वर्ष भी नहीं । क्या दीवानापन था ... शहीदों ! आपकी शहादत को नमन ।  जीवन का हर पल दे डाला जिसने उसकी चौखट पर । प्राणदीप से किया उजाला जिसने उसकी चौखट पर ।
 श्रद्धा का एक दीप जलाएं चल कर चौरी चौरा में ।
 क्रांति युद्ध की सदी मनाएं चल कर चौरी चौरा में ।
    चौरी चौरा में जो घटा, उसका शताब्दी वर्ष है यह।  हम सबको यहां आना चाहिए... बार - बार आना चाहिए , ताकि उन्हें, जिनके 'कल' के लिए  उन हुतात्माओं ने अपना 'आज' कुर्बान कर दिया .आजादी के मोल का स्मरण रहे...... जय हिंद - जय भारत ।
     (कवितांश - अनामिका जैन 'अम्बर ' )