अद्भुत है ..अप्रतिम है ..अनिर्वचनीय है - तुम्हारी कारीगरी ।
अभिभूत आँखें आबद्ध हैं ,
तुम्हारे शिल्प के मोहपाश में ।
खजुराहो के शिल्पी !
प्रणम्य है तुम्हारी साधना।
यद्यपि, आज
अ क्षत नही है एक भी आकृति ,
अंग-भंग आकृतियों का मौन चीख रहा है, कि
ऐसा भी दौर गुजरा है ।
सुनो - अगर सुन सको ,
समझो - अगर समझ सको ,
कितना जहर था उन आक्रान्ताओं में,
जिन्हें त्रिभंग का सौन्दर्य रास न आया ।
हाथ में आरसी थामें, खुद को सवांरती
शर्माती-सकुचाती ,
नव यौवना की नाक टूटी पडी़ है ।
सद्य स्नाता का मुख ,
खिड़की का पट खोल झांकती युवती की आंखें ,
पायल पहनती ,
सिन्दूर लगाती ,
केश के साथ कौतुक करती अप्सराओं ,
अपने ही पांव का काटा निकालती स्त्री ,
जैसी हजारों कलाकृतियों के अंग, भंग हैं ।
मंदिरों के सारे बिग्रह टूटे पड़े हैं ।
हम शर्मिंदा हैं शिल्पी,
इस छल से ,कि
इतिहास की किताबों के कई सारे पाठ, अब भी
इन्हीं वहशी आक्रान्ताओं के नाम हैं ।
मैं लौट रहा हूँ - स्वअनुभूत भाव - निर्मिति के साथ, कि शहंशाहों की सनक से संस्कृतियाँ विनष्ट हो जाती हैं, कि
इतिहास सब कुछ नहीं बताता, और
इतिहास जो बताता है वही पूर्ण सत्य नहीं होता ।
इतिहास, सायास आयोजन है,
कई बार , निश्चित स्थापना के प्रयोजन से युक्त ,
नृप - राग से भरा ,
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