मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022
रंग बनारसिया ...
कल काशी में उत्सव था - रंग - रंगोली का उत्सव... दिये का उत्सव ...आस्था का उत्सव ...आदि योगी की आराधना का उत्सव ....बाबा दरबार के नव श्रृंगार का उत्सव ...सांस्कृतिक चेतना के नव संस्कार का उत्सव ...उत्सव भारतीयता के अभिमान का था..... उत्सव सनातन के सम्मान का था ...उत्सव था - गंगधार और गंगाधर की आराधना के बहाने सनातन - संस्कृति के मूल मंत्र, ' सर्वे भवंतु सुखिनः , सर्वे संतु निरामया ' और 'वसुधैव कुटुंबकम ' के उद्घोष का .. लेकिन , बड़बोले छिद्रान्वेषियों ने इसे सियासत का उत्सव बना दिया । हां !सुबह चाय की अड़ी पर कल के महा उत्सव से खीझे बुजुर्ग कह रहे थे - ' ससुरे ने हर आयोजन को इवेंट बना कर रख दिया है । जनता के धन को बेशर्मी से उड़ा रहा है '। चाय वाले ने मुस्कुरा कर कहा , गुरु ! एतना परेशान काहे हवा ..जे करी उहै न देखायी । ऊ कइलैं त देखउलें..।' चाय पीने के लिए रुके ऑटो वाले ने अपनी बात जोड़कर गुरु की खीझ और बढ़ा दी - अब तू लोगन सोचा ...ऊ त इतिहास बना देहलन ... हऊ बीएचयू क ट्रामा सेंटर और कैंसर हॉस्पिटल कब से बनत रहल ..मोदी - योगी अईलन त बनवा देहलन.. त फितवा भी त ऊहै न कटिहन ... नराज काहे होत हवा ...गारी देहले से का होई ....तोहन लोगन के एहि आदत से त ऊ सब अइबै कइल ..कहां काशी कहां गुजरात ...फूल बरसत हौ ओप्पर आज ...काशी में फूल बरसत हौ गुरु ! ...आ सुना - भोर सबके खातिर होला, लेकिन सब भोर में ना उठैला ...भोर में ऊहै जागैला जे राती में संकल्प लेला कि भोर में ऊठब ..जोगी जागै लैं ..गृहस्थ जागै लैं ..जेके कुछ करै के होला ते जागैला ..बाकी कुछ लोग त अबहिन सुत्तल होइहै ....जब जगिहैं सुरुज कपारे पर होई ..अऊर ऊ चिल्लैहै ई का भईल ..एतना दिन निकल गईल ... अब आपन बार नोचा ससुर! ....गरियावा सुरुज भगवान के ... तोहरे सुतले से दिन रुकी का ..? ई साधना हौ साधना .. एकरे खातिर तपस्या करै के होला ..जागै के होला ..कुछ करै के होला ..बाकी, खाली बकैती करै के हव त करा .. गुरु ! ई दुनिया न रुकल हौ न रुकी ..हर हर महादेव ..।
शनिवार, 3 जुलाई 2021
कन्हैया कहाँ मिलैगो .....
अब,जब मथुरा से लौटने को हूं ...सोच रहा हूँ -मथुरा से वृन्दावन तक कई सारे मंदिरों की दौड़ लगा ली,कृष्ण के नाम पर बड़े बड़े आयोजन देख लिए,राधे राधे की टेर सुन ली,स्वनामधन्य पंडों -पंडितों के प्रवचनों का श्रवण पान भी कर लिया,लेकिन ब्रजवारन को प्रेम का साक्षात्कार नहीं हुआ।मैं सोच रहा हूँ -मेरी भाग-दौड़ सीमा बन्द थी या मेरी खोज ही मृग मरीचिका सादृश्य है।कृष्ण से साक्षात्कार कराने के तमाम विग्यापन ब्रजनगरी में विग्यापित हैं लेकिन कृष्ण इन विग्यापकों के कब से हो गये ..?
निष्काम कर्म के सिद्धांत कार की कृष्ण नामी ओढ़े,उन्नत ललाट,शुभ्रवसनधारियों के सब कर्म सकाम हैं।जसोदा के कृष्ण,देवकी के कृष्ण,सुदामा के कृष्ण,बलदाउ के कृष्ण,अर्जुन के कृष्ण,राधिका के कृष्ण,रूक्मिणी के कृष्ण,द्रौपदी के कृष्ण,उधौ के कृष्ण मथुरा के कृष्ण,द्वारिका के कृष्ण ..मेरे लिखे की सीमा है किंतु कृष्ण का स्वरूप तो सीमातीत है ।
निष्काम कर्म के प्रस्तोता की लीला - भूमि पर इसके प्रभाव की रंचमात्र अनुभूति भी तो नहीं हुई।हाय! महादुख पाये सखा तुम आये इतै न कितै दिन खोये,कहकर गरीब सुदामा को भर अंकवार भेंटनें वाले मनमोहन के ब्रजमंडल में अब गरीब सुदामा का कोई तारनहार नहीं है बल्कि मौका मिले तो जय श्रीकृष्णा और राधे-राधे का जाप करते जेबतराश अवश्य अपनी उपस्थिति का अहसास करा देंगे।एक आटो वाला १० के ३० मांग रहा था।श्रद्धा -भाव से अविभूत श्रद्धालु कहाँ प्रतिवाद करते,एक स्थानीय व्यक्ति झगड़ बैठा।आटो वाले का कुतर्क धर्म-धारित करने वाली इस नगरी की वर्तमान पंडिताई की बानगी था - ओए ताऊ ! सीजन में दो रूपये किलो का आलू बीस रूपये किलो बिकता है, दो - तीन दिन का मामला है फिर तो वही राधे-राधे, जय श्रीकृष्ण।खैर! यह- युग - संक्रमण है ।
पूजा - प्रसाद बाटते एक लक दक पंडाल का लाउडस्पीकर भजन प्रसरित कर रहा था,भजन की टेक थी - कन्हैया कहाँ मिलैगो...।मैं सोचने लगा,यह सवाल उस ब्रज में क्यों पूछा जा रहा है,जहाँ छछिया भर छाछ पर कन्हैया नृत्य करते थे।यह बात इतने से स्पष्ट न हो,शायद ....
सेस,गनेश,महेश,दिनेश,सुरेशहु जाहि निरन्तर गावै
जाहिअनादि,अनन्त,अखंड,अछेद,अभेद,सुबेद बतावै
नारद से शुक व्यास रटें,पचिहारे तउ पुनि पार न पावै
इतना ही नहीं ,
गावै गुनी गनिका,गन्धर्व ओ सारद सेस सबै गुण तावै
नाम अनन्त,गनन्त गनेश जो ब्रह्म त्रिलोचन पार न। पावै
जोगी,जती,तपसीअरू सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि। लगावै
ताहि अहीर की छोहरियां,छछिया भर छाछ ने नाच। नचावत
ऐसे ब्रज में , जिसे खुद कृष्ण भी विस्मृत नहीं कर पाते -उधौ ! मोहि ब्रज बिसरत नाहि,में कन्हैया कहाँ मिलैगो की टेर क्यों लगने लगी..।वास्तव में लोग यही भूल गए कि योगीराज कृष्ण का कुल कृतित्व मनुष्यत्व की स्थापना के निमित्त था।भव्य भंडारों की जगह उन्हें गुरूमाता के चने की चाव थी।वह तन्वुल का तगादा करते हैं और प्रेम की टेर पर सब कुछ भूल जाते हैं।यहाँ वह साख्य भाव,वह प्रेम ही तिरोहित हो गया है।रसखान ने बड़े सलीके से बताया है - कन्हैया कहाँ मिलेंगे ...
ब्रह्म में ढूढ्रयो पुरानन-गानन वेद रिचा सुनि चौगुने गायन
देख्यो,सुन्यो कबहूं न कहूं वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन
टेरत ,हेरत हारि परयो रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देख्यो दुरो वह कु्ंज कुटीर में बैठो पलोटतु राधिका -पायन ।
केन ...जो शजर गढती है ।
हथेली पर ,
थोड़ी सी ,
जल - राशि ठहराकर ,
देखता रहा ....अपलक।
तमाम पत्थरों से लड़ते - झगड़ते, सहलाते - दुलराते, इठलाती - बलखाती बही जा रही है केन।
स्वच्छ ,शीतल और अमृतत्व से भरी,
दुनिया की इकलौती नदी - जो शजर गढती है।
मुम्बई की मशीनों में तराशे जाने के बाद ,
ईरानी बाजार में ,
मुहमांगी कीमत पर बिकते हैं शजर।
किनारों पर आबाद,
आबादी के ठीहों पर बैठे मुम्बईया कारोबारी, और
स्थानीय शजर शोधकों के गठजोड़ से बेपरवाह ,
शजर अब भी गढ रही है केन।
अपने ही सगे - शुभचिन्तक बाजार के प्रभाव में हैं,
खूब जानती है केन।
बावजूद इसके, अपने स्वभाव में है केन।
यमुना में मिलकर,
यमुना हो जाने से पहले,
अब भी,
नित नये शजर गढती है केन।
अद्भुत है खजुराहो का शिल्प ...
अद्भुत है ..अप्रतिम है ..अनिर्वचनीय है - तुम्हारी कारीगरी ।
अभिभूत आँखें आबद्ध हैं ,
तुम्हारे शिल्प के मोहपाश में ।
खजुराहो के शिल्पी !
प्रणम्य है तुम्हारी साधना।
यद्यपि, आज
अ क्षत नही है एक भी आकृति ,
अंग-भंग आकृतियों का मौन चीख रहा है, कि
ऐसा भी दौर गुजरा है ।
सुनो - अगर सुन सको ,
समझो - अगर समझ सको ,
कितना जहर था उन आक्रान्ताओं में,
जिन्हें त्रिभंग का सौन्दर्य रास न आया ।
हाथ में आरसी थामें, खुद को सवांरती
शर्माती-सकुचाती ,
नव यौवना की नाक टूटी पडी़ है ।
सद्य स्नाता का मुख ,
खिड़की का पट खोल झांकती युवती की आंखें ,
पायल पहनती ,
सिन्दूर लगाती ,
केश के साथ कौतुक करती अप्सराओं ,
अपने ही पांव का काटा निकालती स्त्री ,
जैसी हजारों कलाकृतियों के अंग, भंग हैं ।
मंदिरों के सारे बिग्रह टूटे पड़े हैं ।
हम शर्मिंदा हैं शिल्पी,
इस छल से ,कि
इतिहास की किताबों के कई सारे पाठ, अब भी
इन्हीं वहशी आक्रान्ताओं के नाम हैं ।
मैं लौट रहा हूँ - स्वअनुभूत भाव - निर्मिति के साथ, कि शहंशाहों की सनक से संस्कृतियाँ विनष्ट हो जाती हैं, कि
इतिहास सब कुछ नहीं बताता, और
इतिहास जो बताता है वही पूर्ण सत्य नहीं होता ।
इतिहास, सायास आयोजन है,
कई बार , निश्चित स्थापना के प्रयोजन से युक्त ,
नृप - राग से भरा ,
अलविदा ! मंगलेश दा ...
आप ने तो मुक्तिपथ की राह ले ली मंगलेश दा! सचमुच में, "घटती हुयी आक्सीजन" से छटपटाते और घटते जा रहे आपसी "स्पेस" से अकुलाते मन की व्यथा अब कौन कहेगा ? आप तो पहाड़ के आदमी थे ,भले ही मैदान उतर आये थे, जीवट तो वही था - पहाड़ वाला। ठीक कहा आपने,इस दुनिया में, जहाँ हम ही रहते हैं - अब सांस लेना भी मेहनत का काम लगता है .......अलविदा मंगलेश दा !
अक्सर पढ़ने में आता है
दुनिया में ऑक्सीजन कम हो रही है
कभी ऐन सामने दिखाई दे जाता है कि वह कितनी तेज़ी से घट रही है
रास्तों पर चलता हूँ खाना खाता हूँ पढ़ता हूँ सोकर उठता हूँ
तो एक लंबी जमुहाई आती है
जैसे ही किसी बंद वातानुकूलित जगह में बैठता हूँ
उबासी एक झोंका भीतर से बाहर आता है
एक ताक़तवर आदमी के पास जाता हूँ
तो तत्काल ऑक्सीजन की ज़रूरत महसूस होती है
बढ़ रहे हैं नाइट्रोजन सल्फ़र कार्बन के ऑक्साईड
और हवा में झूलते अजनबी और चमकदार कण
बढ़ रही है घृणा दमन प्रतिशोध और कुछ चालू क़िस्म की खुशियां
चारों ओर गर्मी स्प्रे की बोतलें और खुशबूदार फुहारें बढ़ रही हैं
अस्पतालों में दिखाई देते हैं ऑक्सीजन से भरे हुए सिलिंडर
नीमहोशी में डूबते-उतराते मरीज़ों के मुँह पर लगे हुए मास्क
और उनके पानी में बुलबुले बनाती हुई थोड़ी सी प्राणवायु
ऐसी जगहों की तादाद बढ़ रही है
जहाँ सांस लेना मेहनत का काम लगता है
दूरियां कम हो रही हैं लेकिन उनके बीच निर्वात बढ़ता जा रहा है
हर चीज़ ने अपना एक दड़बा बना लिया है
हर आदमी अपने दड़बे में क़ैद हो गया है
स्वर्ग तक उठे हुए चार-पांच-सात सितारा मकानात चौतरफ़
महाशक्तियां एक लात मारती हैं
और आसमान का एक टुकड़ा गिर पड़ता है
ग़रीबों ने भी बंद कर लिये हैं अपनी झोपड़ियों के द्वार
उनकी छतें गिरने-गिरने को हैं
उनके भीतर की हवा वहां दबने जा रही है
आबोहवा की फ़िक्र में आलीशान जहाज़ों में बैठे लोग
जा रहे हैं एक देश से दूसरे देश
ऐसे में मुझे थोड़ी ऑक्सीजन चाहिए
वह कहाँ मिलेगी
पहाड़ तो मैं कब का छोड़ आया हूँ
और वहाँ भी वह
सि़र्फ कुछ ढलानों-घाटियों के आसपास घूम रही होगी
दम साधे हुए मैं एक सत्ताधारी के पास जाता हूँ
उसे अच्छी तरह पता है दुनिया का हाल
मुस्कराते हुए वह कहता है तुम्हें क्यों फ़िक्र पड़ी है
जब ज़रूरत पड़े तुम माँग सकते हो मुझसे कुछ ऑक्सीजन।
श्री राधा रानी मंदिर, बरसाना, मथुरा
प्रेम कथानि की बात चलैं चमकै चित चंचलता चिनगारी।
लोचन बंक बिलोकनि लोलनि बोलनि मैं बतियाँ रसकारी।
सोहैं तरंग अनंग को अंगनि कोमल यौं झमकै झनकारी।
पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी।
अहो पथिक कहियो उन हरि सों ...विशेष सन्दर्भ : मथुरा की यमुना
अहो पथिक कहियो उन हरि सों ....विरह -व्यथा से पीडित गोपी के लिए तो फिर भी एक आलम्ब था लेकिन हम कालिंदी के ' कारी ' होने का संदेशा किसको भेजें ...? उसकी तडपन रुपी तरंग भी अब शांत है और भंवरें तो उसमें अब पडती ही नहीं ....अब इसके किनारे कोई चक्रवाकी पी पी नहीं रटती ...बाजार टेरता है ...स्वारथ की टेर।
देखियत कालिंदी अति कारी |
अहौ पथिक कहियौ उन हरि सौं, भयौ बिरह जुर जारी ||
गिरि-प्रजंक तैं गिरति धरनि धसि, तरंग तरफ तन भारी |
तट बारू उपचार चूर, जल-पूर प्रस्वेद पनारी ||
बिगलित कच कुस काँस कूल पर पंक जु काजल सारी |
भौंर भ्रमत अति फिरति भ्रमित गति, निसि दिन दीन दुखारी ||
निसि दिन चकई पिय जु रटति है, भई मनौ अनुहारी |
सूरदास-प्रभु जो जमुना गति, सो गति भई हमारी ।
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