बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

गंगा आरती, अस्सी घाट, बनारस

श्री परमहंस आश्रम, शक्तेशगढ, चुनार

चालत चालत पग थका, नगर रहा नव कोस ।
बीचे में डेरा गिरा , कहौ कौन का दोस ।। 
मन युक्ति सों ही रुके , माला टालो लाख। 
सद्गुरु प्रेरक आत्मा , मानव का बल खाख ।।
योग अगिनि सद्गुरु कृपा , जागत मन के बीच ।
'अड़गड़' सद्गुरु ना मिला , भजन जल्पना कीच।।

स्वर्ण मंदिर,अमृतसर

"अठ सठि तीरथ जहं साध पग धरहि " मतलब गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब, अमृतसर, पंजाब। दुनिया इसे स्वर्ण मंदिर के नाम से जानती है। हृदय-स्थल है यह सिख धर्म का । गुरु - स्वरुप पवित्र गुरुग्रंथ साहिब यहीं विराजित हैं।  
भारतीय दर्शन परम्परा का नायाब खजाना है इसमें। बारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच, पांच सौ वर्षों के बीच की आध्यात्मिक तत्व मीमांसा का सार संकलन है गुरु ग्रंथ साहिब। कुल 36 संत कवियों की प्रतिनिधि बानियों का संयुक्त स्वरुप। यह गुरु - दरबार, सेवा - भाव की ऐसी मिशाल है  ,जो अन्यत्र दुर्लभ है । कहते हैं - चौथे गुरु अर्जुन साहिब ने, लाहौर के मुस्लिम संत हजरत मियां मीर से इसकी नींव रखवायी थी। अगर इस प्रतीक का मर्म समझा जा सके, तो धर्म समझा जा सकता है और जिया भी   ....।
            इक ओंकार सतनाम .........।
    वाहे गुरु दा ख़ालसा वाहे गुरु दी फतेह ... ।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

मैत्रेय महानिर्वाण स्थल, कुशीनगर

कृपया मौन रहें ..
दुनिया को,
जरा - मरण के  दारुण दुख से मुक्त करने के लिए ,
शील -  समाधि और प्रज्ञा का अमोघ रसायन उपलब्ध कराने वाला ,
पवित्र  कीमियागर  यहां सोया हुआ है ।
यहां आकर जाना - मैत्रेय का मौन बहुत मुखर है ,
यह साधना भी है और औषधि भी ।
हालांकि, 
मिथ्याचार और पाखंड यहां भी चले आए हैं ।
चले ही आते हैं , काल - दोष है शायद ।
नहीं तो, 
सामिषरहनी और करुणाकर की कहनी का तुक क्या है ?कृपया , अपने तर्कों के तीर तरकस में ही रहने दें ,
यहां बुद्धि - विलास का कोई काम नहीं ।
यहां तो , 
प्रयोग है और फिर अनुभूति,
करके देख लें ।
भोर का समय था, 
पूनम की रात का पूरा चांद अब छिपने ही वाला था ,
धर्म - जिज्ञासु पूछ बैठा - धर्म बताएं ?
आनंद को पता था - यह शास्ता के महाप्रयाण की बेला है वह असहज हो उठा - रोका उसने , लेकिन 
निर्वाण की बेला में भी करुणाकर की करुणा छलक पड़ी आने दे रे!  यह धर्म जानना चाहता है ।
सचमुच के सम्मासंबुद्ध ने , 
पहले धर्म ज्ञान दिया , फिर निर्वाण की राह ली ।
अनिच्च .. अनिच्च का सूत्र बाटती ,
करुणा अब भी बरस रही है - जिज्ञासु आए तो सही .....।

रंग बनारसिया

कहते हैं -  ऋग्वेद में वर्णित ' काशिरित्ते ' संसार की प्राचीनतम नगरी है। यह लोकोत्तर है .. तीनों लोकों से न्यारी । महादेव के त्रिशूल पर विराजती है काशी । काशी का महात्म्य अद्भुत है ..अप्रतिम है ..अनिर्वचनीय । तभी  तो कहा गया  - ' काश्यां विदेहकैवल्यं भवतीति सुनिश्चतम ' । कल काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के दिव्य धाम का भव्य लोकार्पण है। निमित्त असीम नहीं होता , फिर भी , कई बार अपेक्षित से अधिक की प्राप्ति आह्लादित करती है और श्रद्धा का सृजन भी । निमित्त का संकल्प और उसका अर्पण श्रद्धेय  है।15 साल का था , तब से काशी आने की स्मृति है । बार-बार आता हूं । मुझे याद है , गंगधार के बीच में , सहसा उछलकर डूब गयी सोंस देख कर मन प्रफुल्लित हो गया था । बाद में , वह दौर भी देखा जब गंगधार को डेड वाटर मान लिया गया । जलीय जीवों का तो कोई अता पता ही नहीं था , घाट के किनारे से दुर्गंध आती थी ।1वर्ष पूर्व आया था तो गंगा में मछलियां मारते लोगों को देख बड़ा कौतूहल हुआ । नजदीक जाकर देखा , तो असंख्य नन्ही मछलियां भागती - नाचती नजर आयीं....अद्भुत दृश्य। देशभर के चैनलों के एंकर - कैमरामैन अपनी - अपनी आईडी के साथ घाट - घाट घूम रहे हैं । पूछ रहे हैं - काशी कितनी बदली है ? बहुत बदली है भाई ! देख सको तो देखो । वैसे , यह अनुभूति का विषय है और इसे अनुभव करने के लिए 2014 से पहले की काशी की स्मृति भी होनी ही चाहिए....।

रंग बनारसिया

सचमुच ....बम बम बोल रहा है काशी .
 आज सुबह जब चाय पीने निकला तो देखा अस्सी की चाय की अड़ियां बंद है ।आज प्रधानमंत्री और कई राज्यों के मुख्यमंत्री सहित देशभर से साधु-संतों और अन्य कई गणमान्य लोगों का आगमन हो रहा है । हेतु है - बाबा विश्वनाथ धाम के नव स्वरूप के लोकार्पण समारोह का साक्षी बनना। अड़ीबाज पीड़ा में हैं - चाय वाले ने चाय की दुकानें बंद करा दी ..। रेहड़ी - पटरी वालों की एक-दो दिन की रोजी - रोटी की चिंता में दुबले हुए जा रहे  हैं।  गरियाये जा रहे हैं ...मां - बहन सब । बेहद अभद्र , फिर भी कोई भाव नहीं दे रहा । कुछ साथ के लोग हैं - हां में हां मिला रहे हैं । उम्र सबकी साठ के पार ही होगी । मैं वहां से चला आया .. अखबार वाले के पास । पुराना परिचित है । अखबार लिया और वहीं खड़े एक महोदय से कह  बैठा - उधर कुछ लोग हैं , बुज़ुर्ग हैं , मोदी को बहुत भद्दी भद्दी  गालियां दे रहे हैं। महोदय ने भी दर्जनभर गालियों के साथ उन लोगों के खाये - अघाये  होने को याद किया, और यह भी कहा कि सठिया गए हैं , सब उम्र बीत गई लेकिन मुँहजोरी नहीं गई । मुझे याद आया - काशीनाथ सिंह ने काशी का अस्सी में , शायद इसीलिए अस्सी और भाषा के बीच ननद - भौजाई और साली - बहनोई का रिश्ता बताया था । आप इन पर क्रुद्ध ना हो , हां ! संभव हो तो आप भी गरिया लें । बाकि तो , अखबार लिख रहा - आज का दिन काशी के लिए ऐतिहासिक है .. आसमान में सुराख करने जैसा है यह पराक्रम। खूबसूरत रंगोली और पेंटिंग से घाट सजे पड़े हैं ...शाम को दिए जलेंगे । अस्सी पर , कैमरा सेट कर लाइव वाइट ले रहे राष्ट्रीय चैनल के रिपोर्टर ने , गंगा स्नान कर लौट रहे त्रिपुंडधारी धारी परिवार को रोककर पूछा - मोदी जी के आने के बाद काशी में क्या सचमुच बदलाव आया है ?त्रिपुंडधारियों ने रिपोर्टर को ऐसे देखा , जैसे कह रहे हो, दिख नहीं रहा है क्या ? और फिर दोनों हाथ हवा में लहराते हुए समवेत स्वर में बोल उठे ...हर हर महादेव । रिपोर्टर का मुंह देखने लायक था......।

रंग बनारसिया ...

कल काशी में उत्सव था - रंग - रंगोली का उत्सव... दिये का उत्सव ...आस्था का उत्सव ...आदि योगी की आराधना का उत्सव ....बाबा दरबार के नव श्रृंगार का उत्सव ...सांस्कृतिक चेतना के नव संस्कार का उत्सव ...उत्सव भारतीयता के अभिमान का था..... उत्सव सनातन के सम्मान का था ...उत्सव था - गंगधार और गंगाधर की आराधना के बहाने सनातन - संस्कृति के मूल मंत्र, ' सर्वे भवंतु सुखिनः , सर्वे संतु निरामया ' और 'वसुधैव कुटुंबकम ' के उद्घोष का  .. लेकिन , बड़बोले छिद्रान्वेषियों ने इसे सियासत का उत्सव बना दिया । हां !सुबह चाय की अड़ी पर कल के महा उत्सव  से खीझे बुजुर्ग कह रहे थे - ' ससुरे ने हर आयोजन को इवेंट बना कर रख दिया है । जनता के धन को बेशर्मी से उड़ा रहा है   '। चाय वाले ने मुस्कुरा कर कहा , गुरु !  एतना परेशान काहे हवा ..जे करी उहै न देखायी । ऊ कइलैं त देखउलें..।' चाय पीने के लिए रुके ऑटो वाले ने अपनी बात जोड़कर गुरु की खीझ और बढ़ा दी - अब तू लोगन सोचा ...ऊ त इतिहास बना देहलन ... हऊ बीएचयू क ट्रामा सेंटर और कैंसर हॉस्पिटल कब से बनत रहल ..मोदी - योगी अईलन त बनवा देहलन.. त फितवा भी त ऊहै न कटिहन ... नराज काहे होत हवा ...गारी देहले से का होई ....तोहन लोगन के एहि आदत से त ऊ सब अइबै कइल ..कहां काशी कहां गुजरात ...फूल बरसत हौ ओप्पर आज  ...काशी में फूल बरसत हौ गुरु ! ...आ सुना - भोर सबके खातिर होला, लेकिन सब भोर में ना उठैला ...भोर में ऊहै जागैला जे राती में संकल्प लेला कि भोर में ऊठब ..जोगी जागै लैं ..गृहस्थ जागै लैं ..जेके कुछ करै के होला ते जागैला ..बाकी कुछ लोग त अबहिन सुत्तल होइहै ....जब जगिहैं सुरुज कपारे पर होई ..अऊर ऊ चिल्लैहै ई का भईल ..एतना दिन निकल गईल ... अब आपन बार नोचा ससुर! ....गरियावा सुरुज भगवान के ... तोहरे सुतले से दिन रुकी का ..? ई साधना हौ साधना  .. एकरे खातिर तपस्या करै के होला  ..जागै के होला ..कुछ करै के होला ..बाकी, खाली बकैती करै के हव त करा .. गुरु !  ई दुनिया न रुकल हौ न रुकी ..हर हर महादेव ..।