शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

प्रेम सरोवर, वृन्दावन, मथुरा

'बरसाना' से नंदगांव जाते हुए रास्ते में 'संकेत' गांव है। कहते हैं - कभी यह 'संकेत वन' था। यहीं पहली बार राधा -कृष्ण का आमना सामना हुआ था, मिले थे। यहां एक मंदिर है। कालान्तर में, सूरदास जी ने इस मिलाप का बड़ा सुन्दर चित्रण किया  - 
       खेलत हरि निकसै ब्रज-खोरी
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा,चक, डोरी ॥
मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि बर, बसन-दमक दामिनि-छबि छोरी ।
गए स्याम रबि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी ॥
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिये रोरी ।
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी ।
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी ।
सूर स्याम देखत हीं रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥
                 थोडा़ आगे प्रेम सरोवर है और सुदामा की कुटिया भी - देखने वालों के लिए। नंदगांव की तरफ बढते समय एक साइनबोर्ड ने रोक लिया - गोपी - उद्धव संवाद स्थल के बोर्ड ने। यह स्थल सडक से अंदर है ।बोर्ड पर पद पढकर सहज ही रत्नाकर जी के उद्धव शतक की याद हो आयी, जहां प्रेम के आगे ग्यान की गठरी लादे उद्धव महाराज जी निरुत्तर हैं-
  आये लोटि लज्जित नवाए नैन उद्धव अब...
इससे पहले -  क्या क्या नहीं सुनना पडा़ उद्धव को ...
 'आये हो पठाए वा छतोरो छलिया कै इतै '..
इतना ही नहीं, इससे भी आगे और अधिक बेधक तंज -
'आए कंसराई कै पठाए वे प्रत्यक्ष तुम '...के बाद -
 'चुप रहो उधौ पथ मथुरा को गहो' की कठोर सलाह भी .....
वैसे भी अब तक उद्धव ...
भूले जोग - छेम प्रेम नेमति निहारि उधौ 
सकुचि समाने उर -अंतर हरास लौ...।
सचमुच...  प्रेम की गति कितनी गहन है........।

बुधवार, 23 जून 2021

काकंदी तीर्थ, खुखुन्दी, देवरिया

काकंदी मंगलं कुर्यात, पुष्पदंतस्य जन्मभूः। 
आनंदं तनुताद भूमौ, सर्वमंगलकारिणी।। 
                        नवम जैन तीर्थंकर पुष्पदंतनाथ की पंच कल्याणक पावन भूमि - सिद्ध क्षेत्र ......काकंदी तीर्थ।

सूर्य मन्दिर, तुर्क पट्टी, कुशी नगर

एक दिन रात में सोते समय मैंने सपना देखा कि यहीं नीचे सूर्य भगवान की प्रतिमा विद्यमान है ..निश्चित स्थान की तरफ इशारा करते हुये बता रहे थे सुदामा शर्मा। बाद में, जब यह बात उन्होने और लोगों को बतायी तो किसी को यकीन ही नही हुआ। खैर , विश्वास  - अ विश्वास  के बीच स्थानीय लोगों द्वारा की गयी खुदाई में, सुदामा शर्मा द्वारा बताये गये स्थान से दो बेशकीमती सूर्य प्रतिमायें प्राप्त हुयीं। एक के विग्रह खंडित हैं इसलिये यह पूजित नही है। दूसरी मंदिर में स्थापित है। बाकी सब कुछ विशेषज्ञों के अध्ययन का निष्कर्ष है जो नया -पुराना होता रहता है - आप इसमें अपने लिए महत्वपूर्ण तथ्य चुन सकते हैं - 
    कि, यह उत्तर भारत का इकलौता सूर्य मंदिर है। 
    कि, इसमें स्थापित प्रतिमा गुप्तकालीन है ।
    कि, इसमें स्थापित प्रतिमा कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर से भी पुरानी है ।
    कि,  यह प्रतिमा नील मणि पत्थर की बनी है ।
    कि,  इसमें सूर्य देव के अतिरिक्त उनके सात घोड़े, उनकी रानियां , सारथी अरुण, स्वागत मुद्रा में  किन्नर- गंधर्व सहित शनि, राहु ,केतु और अन्य कई लोगों के चित्र भी उत्कीर्ण हैं।
             वैसे, जब मैं सुदामा शर्मा से वहां के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहा था, पूरा परिसर शादी की तैयारी के ताम - झाम से आच्छादित था। मंदिर की पुण्यता - पवित्रता के ख्याल से परे, आज की शाम बड़ी भडकीली  होने वाली थी। मैंने सुदामा शर्मा से पूछा, ये सब क्या है? उन्होंने धीरे से कहा - स्थानीय धनिक के बेटे की तिलक का जलसा है ...मैने देखा - मंदिर के बाहर बैठे युवा पुजारी के कंधे पर पड़ा रंगीन नव पटका खूब फब रहा था।

देवरहा बाबा आश्रम, मईल,देवरिया

यहाँ जो भी निर्माण दिख रहा है, सब 90 के बाद का है। हम जहाँ बैठे हैं, जिस जगह लकड़ी के खम्भों पर एक कुटिया है, यहीं बाबा की मचान हुआ करती थी....पोरसा भर पानी में...सरजू मईया की गोद में। यहां तक बहती थी मईया ।89 में बाब मथुरा चले गए .....समाधि लेने। बाबा के मथुरा गमन के बाद सरजू मईया भी यहाँ से दूर चली गयीं ...दक्षिण की ओर। उन्होंने भी यह स्थान छोड़ दिया। बाबा के संस्मरण सुनाते सुनाते संत श्री कहीं खो - से गए ... बाबा जब बंगाल में थे तो उनके पास तमाम पशु पक्षी भी आते रहते थे ...मिलने के लिए ..बाघ भी। एक दिन बाबा उदाश थे ...कह रहे थे - मोहन भगत अब नहीं रहा ..गुजर गया। यह एक बाघ था ..हां! बाघ ही। देह - चक्षु की एक सीमा है ...  यह उसके आगे नहीं देख सकतीं। इन्होंने उसे बाघ ही देखा था। बाकी,  बाबा जानें। जाने कितने किस्से हैं लोगों के पास ..कितनी कहानियां। अगर आप जानना चाहते हैं तो आप उन तमाम लोगों से मिल सकते हैं जिनकी स्मृति बाबा के सान्निध्य - संजोग से सृजित अद्भुत अनुभूतियों से समृद्ध है। मैं संत - साधना की इस पुण्य भूमि को अपना प्रणाम निवेदित करने आया था ...बाबा करें - यह संयोग पुनः घटे ....ऊंँ नमो भगवते वासुदेवाय .....

डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को क्यो गिरफ्तार किया गया? एक निशान, एक विधान, एक प्रधान का नारा आखिर लगाना ही क्यो पड़ा.? तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी बार बार देश को आश्वस्त कर रहे थे कि कश्मीर सौ फीसदी भारत का अंग है तो फिर इस पर संदेह क्यो था ? इन प्रश्नों का हल ढूढने के कौतूहल ने इतिहास के तत्कालीन दौर में ताक- झाक करने को प्रेरित किया.
 5मार्च 1952 को दिल्ली में आंदोलन की शुरुआत करते हुए डॉ साहब ने लक्ष्य सार्वजनिक  किया था - अन्याय के विरुद्ध न्याय की स्थापना के लिए, तानाशाही के विरुध्द लोकतंत्र की विजय के लिए और विघटन के विरुध्द राष्ट्रीय एकता के लिए. संघर्ष का विगुल फूकते हुए उन्होने महात्मा गांधी को याद किया और सत्याग्रह की घोषणा कर दी.
तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति के संबंध में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा हैं - जनमत की खुली अवग्या कर नेहरू जी ने शेख अब्दुल्ला के साथ ऐसा समझौता कर लिया, जिससे न केवल भारत की एकता पर कुठाराघात हुआ, अपितु जम्मू तथा लद्दाख के 15 लाख निवासियों का भविष्य भी ख़तरे में पड़ गया. समझौते के अंतर्गत कश्मीर को अपना पृथक विधान, पृथक प्रधान तथा पृथक निशान रखने का अधिकार दे दिया गया. सारे देश में उस समझौते का विरोध हुआ. डॉ मुखर्जी ने लोकसभा में अपने अकाट्य तर्कों तथा प्रबल प्रमाणों से उस समझौते को भारत तथा कश्मीर दोनों के लिए अहितकर सिद्ध किया, किंतु नेहरू जी अपने दुराग्रह पर डटे रहे. यहां तक कि जम्मू कश्मीर राज्य की वैधानिक स्थिति में मूलभूत परिवर्तन करने से पूर्व उन्होने जम्मू तथा लद्दाख की जनता के प्रतिनिधियों से परामर्श करना भी आवश्यक न समझा.
ऐसी ही राजनैतिक परिस्थिति के बीच डॉ मुखर्जी ने कहा - हम सत्य के लिए संघर्ष છેड़ रहे हैं. न्याय की रक्षा के लिए बलि - पथ पर पांव आगे बढ़ा रहे हैं. अत्याचारों की अग्निपरीक्षा हमारे रूप को और भी निखार देगी बलिदानों के गौरवपूर्ण इतिहास में एक उज्जवल अध्याय और जुड जाएगा. आओ, उस इतिहास के निर्माण में हाथ बंटाने के लिए कमर कस कर मैदान में कूद पड़े.
10 मई 1953 को रावी के पुल पर कश्मीर मिलिशिया ने जब उनका रास्ता रोका. बिना परमिट कश्मीर में घुसने से मना किया तो डॉ मुखर्जी ने इसे मानने से इंकार कर दिया. कश्मीर सुरक्षा विधान के अन्तर्गत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्‍तारी के पूर्व भारत की महान जनता के नाम संदेश में उन्होंने कहा - मै जम्मू कश्मीर में प्रविष्ट हो गया हूं, लेकिन एक कैदी की हैसियत से.डॉ मुखर्जी ने अपने पराक्रम से परमिट की दीवार ढहा दी थी और इसी के साथ अनावृत हो गया था नेहरू का असत्य संभाषण कि कश्मीर सौ फीसदी भारत का अंग है. गिरफ्तारी के 43 वे दिन 23 जून 1953 की रात रहस्यमय ढंग से उनकी मृत्यु की घोषणा कर दी गई. तो, क्या वे मर गए? नहीं, वे मरे नहीं, विभाजित भारत की अवशिष्ट एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्र की वेदी पर अपने सर्वस्व की बलि चढ़ाकर अमर हो गए.......
          सादर नमन............

चौरी चौरा शहीद स्मारक, गोरखपुर

100 साल होने को आये .... 4 फरवरी 1922 को - अंग्रेजी हुकूमत के काले सिपाहियों के उकसाने पर, मां भारती की आजादी के मतवालों की गुस्साई भीड़ ने अपनी छाती  आगे कर दी थी । कई शहीद हुए और कई घायल । असहयोग आंदोलन के अहिंसक सिपाहियों के लिए , यह घटना बेहद उत्तेजक और क्षुब्ध कर देने वाली थी । इसके बाद इस घटना की प्रतिक्रिया में जो घटा , इतिहास ने उसे अपने ढंग से लिपिबद्ध किया ।चौरी चौरा थाना आग के हवाले कर दिया गया । थाना परिसर में जो भी था , जिंदा जलकर खाक हो गया ।
 इतिहासों के मुखर स्वरों में अमर कहानी कहन हुई ।
 गोरों की बर्बरता काली पलटन से ना सहन हुई ।
 सपन शांति की गरने वाली आंखों में अग्नि स्तवन हुई ।        चौरी चौरा में गोरों की लंका धू-धू कर दहन हुई ।
    प्रतिक्रिया में , गोरों का दमन चक्र बेहद भयानक था ।अंतिम परिणाम - 19 रणबाकुरों को फांसी , 14 लोगों को आजीवन कारावास और कई अन्य लोगों को दूसरी कठिन सजाएं दी गई । यह कोई प्रशिक्षित लोग नहीं थे , आसपास के गांव के आमजन थे, जिन्होंने भारत की आजादी के हवन कुंड में , अपनी जान की आहुति अर्पित कर दी थी ....
 देकर अपना रक्त जिन्होंने भारत भाग्य संवारा है ।
 सामंतवाद के मुंह पर बढ़कर एक तमाचा मारा है ।
 शौर्य की इस धरती पर डटकर सिंहों ने ललकारा है ।    अंग्रेजों का दंभ जहां पर रणवीरों से हारा है ।
       चौरी चौरा शहीद स्मारक में , इन 19 शहीदों सहित आजादी के कई अन्य दीवानों की प्रतिमा स्थापित है। इन पर अंकित तथ्य बताते हैं कि अधिकांश ने 40 वर्ष की आयु भी नहीं जी और कई तो 30 वर्ष भी नहीं । क्या दीवानापन था ... शहीदों ! आपकी शहादत को नमन ।  जीवन का हर पल दे डाला जिसने उसकी चौखट पर । प्राणदीप से किया उजाला जिसने उसकी चौखट पर ।
 श्रद्धा का एक दीप जलाएं चल कर चौरी चौरा में ।
 क्रांति युद्ध की सदी मनाएं चल कर चौरी चौरा में ।
    चौरी चौरा में जो घटा, उसका शताब्दी वर्ष है यह।  हम सबको यहां आना चाहिए... बार - बार आना चाहिए , ताकि उन्हें, जिनके 'कल' के लिए  उन हुतात्माओं ने अपना 'आज' कुर्बान कर दिया .आजादी के मोल का स्मरण रहे...... जय हिंद - जय भारत ।
     (कवितांश - अनामिका जैन 'अम्बर ' )

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

बाबा नीम करौली धाम ऋषिकेश

ईश्वर एक रहस्य है. रहस्य के संदर्भ में स्वीकृत तथ्य है कि जब तक वह उद्घाटित नहीं हो जाता, तब तक ही वह रहस्य है. भारत - भूमि को यह गौरव प्राप्त है कि यहां विभिन्न काल खंडों में तमाम तत्व दर्शी महात्माओं की उपस्थिति रही है और उनके सान्निध्य में रहने वाले लोगों को परम सत्ता के साक्षात्कार का अवसर भी प्राप्त हुआ है. वैसे भी, प्रत्येक क्षण जीवन सर्वोच्च की उपस्थित का संकेत देता रहता है. हम इसे महसूस कर सकते हैं, शर्त बस एक है - सम्यक चैतन्यता. विराट को ग्रहण करने की पात्रता गुरु - कृपा के बिना असंभव है. अनुभूति के गहनतम क्षणों में यह सत्य अक्सर आकार ग्रहण करता रहा है, सचमुच -  सोई जानइ जेहि देहु जनाई.......