'बरसाना' से नंदगांव जाते हुए रास्ते में 'संकेत' गांव है। कहते हैं - कभी यह 'संकेत वन' था। यहीं पहली बार राधा -कृष्ण का आमना सामना हुआ था, मिले थे। यहां एक मंदिर है। कालान्तर में, सूरदास जी ने इस मिलाप का बड़ा सुन्दर चित्रण किया -
खेलत हरि निकसै ब्रज-खोरी
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा,चक, डोरी ॥
मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि बर, बसन-दमक दामिनि-छबि छोरी ।
गए स्याम रबि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी ॥
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिये रोरी ।
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी ।
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी ।
सूर स्याम देखत हीं रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥
थोडा़ आगे प्रेम सरोवर है और सुदामा की कुटिया भी - देखने वालों के लिए। नंदगांव की तरफ बढते समय एक साइनबोर्ड ने रोक लिया - गोपी - उद्धव संवाद स्थल के बोर्ड ने। यह स्थल सडक से अंदर है ।बोर्ड पर पद पढकर सहज ही रत्नाकर जी के उद्धव शतक की याद हो आयी, जहां प्रेम के आगे ग्यान की गठरी लादे उद्धव महाराज जी निरुत्तर हैं-
आये लोटि लज्जित नवाए नैन उद्धव अब...
इससे पहले - क्या क्या नहीं सुनना पडा़ उद्धव को ...
'आये हो पठाए वा छतोरो छलिया कै इतै '..
इतना ही नहीं, इससे भी आगे और अधिक बेधक तंज -
'आए कंसराई कै पठाए वे प्रत्यक्ष तुम '...के बाद -
'चुप रहो उधौ पथ मथुरा को गहो' की कठोर सलाह भी .....
वैसे भी अब तक उद्धव ...
भूले जोग - छेम प्रेम नेमति निहारि उधौ
सकुचि समाने उर -अंतर हरास लौ...।
सचमुच... प्रेम की गति कितनी गहन है........।